सोमवार, 28 जुलाई 2008

ठाकुर जी

मेरे गाँव से थोडी दूर एक जगह है ठाकुरद्वारा। बहुत पहले हल चलाते समय एक मूर्ति मिली। यह मूर्ति ठाकुर जी की थी। स्थापना हुई तो फ़िर यहाँ श्रद्धा उमड़ने लगी। बाद में लोग ठाकुर जी की कस्मे खाने लगे। अब भी ठाकुर jee वहां बने हैं।

2 टिप्‍पणियां:

MANISH PANDEY LUCKNOW ने कहा…

आनंद भइया वैसे तो मैंने आपका नाम सुना था कभी मिला नही था यह देख कर खुसी हुई की आप भी भडासी बन गए पर आपकी इतनी छोटी सी पोस्ट ब्लॉग पर अच्छी नही लगी

Unknown ने कहा…

bhaiya pranaam iswar se yahi kamna hai ki aap aise hi aage badhte rahe lekin mai aapse gussa bhi hu ki aap apni bahu ko dekhne nahi aaye. gaurav dubey barhalganj